‘पानी और सतत् विकास’ - विश्व जल दिवस-2015 के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ का
सूत्र बिन्दु यही है। भारत में पानी और नदियों के बढ़ते संकट तथा विकास का
आसमान छू लेने की ललक को देखते हुए यह एक चुनौती ही है।
स्वच्छ और भरपूर पानी के बगैर, न 100 स्मार्ट सिटी का सपना साकार हो सकता है और न औद्योगिक निवेश व विकास का। चाहे नमामि गंगे का संकल्प सिद्ध करना हो या स्वच्छ भारत का, स्वच्छ...निर्मल-अविरल जल के बगैर वह भी सम्भव नहीं। फिल्टर, आरओ और बोतलबन्द पानी के भरोसे विकास का पहिया चल नहीं सकता। विकास की चिन्ता करनी है, तो पानी की चिन्ता तो करनी ही होगी। आइए, भारतीय पानी प्रबन्धन की चुनौतियों पर चिन्तन करें; ताकि विकास भी सतत् रहे और पानी भी।
यह अक्सर कहा जाता है कि भारत में पानी की कमी नहीं, पानी के प्रबन्धन में कमी है। किन्तु क्या पानी का प्रबन्धन सरकारों को कोसने से ठीक हो सकता है? दरअसल, यह न सरकारों को कोसने से ठीक हो सकता है, न रोने से और न किसी के चीखने-चिल्लाने से।
हम इस मुगालते में भी न रहें कि नोट या वोट हमें पानी पिला सकते हैं। वोट पानी पिला सकता, तो देश में सबसे ज्यादा वोट वाले उत्तर प्रदेश के बाँदा-महोबा-हमीरपुर में पानी की कमी के कारण आत्महत्याएँ न होतीं। सिर्फ नोट से ही यदि पानी का सुप्रबन्धन सम्भव होता, तो सबसे अधिक बाँध और हमारी पंचवर्षीय योजनाओं में पानी का सबसे अधिक बजट खाने वाले महाराष्ट्र, इस वर्ष गर्मी आने से पहले ही सिंचाई और पेयजल का संकट से बेजार नहीं होता।
यदि कोई कहे कि कोई कच्छ, चेन्नई और कलपक्कम की तरह करोड़ो फेंककर खारे समुद्री पानी को मीठा बनाने की महंगी तकनीक के बूते सभी को पानी पिला देगा, तो यह भी हकीक़त से मुँह फेर लेना है।
हकीक़त यह है कि हमें हमारी जरूरत का कुल पानी न समुद्र पिला सकता है, न ग्लेशियर, न नदियाँ, न झीलें और न हवा व मिट्टी में मौजूद नमी। पृथ्वी में मौजूद कुल पानी में सीधे इनसे प्राप्त मीठे पानी की हिस्सेदारी मात्र 0.325 प्रतिशत ही है। आज भी पीने योग्य सबसे ज्यादा पानी (1.68 प्रतिशत) धरती के नीचे भूजल के रूप में ही मौजूद है।
हमारी धरती के भूजल की तिजोरी इतनी बड़ी है कि इसमें 213 अरब घन लीटर पानी समा जाए और हमारी जरूरत है मात्र 160 अरब घन लीटर। अब ऐसे में भी यदि निकासी ज्यादा हो जाए और संचयन कम, तो कोई भी पानी खातेदार कंगाल होगा ही होगा।
भारत के पानी प्रबन्धन की चुनौती यह है कि अभी तक देश में जलसंरचनाओं के चिन्हीकरण और सीमांकन का काम ठीक से शुरू भी नहीं किया जा सका है। भारत के पास कहने को राष्ट्रीय व प्रादेशिक स्तर पर अलग-अलग जलनीति जरूर है, लेकिन हमारे पानी प्रबन्धन की चुनौतियों को जिस नदी नीति, बाँध नीति, पानी प्रबन्धन की जवाबदेही तथा उपयोग व मालिकाना सुनिश्चित करने वाली नीति, जल स्रोत से जितना लेना, उसे उतना और वैसा पानी वापस लौटाने की नीति की दरकार है, वह आज भी देश के पास नहीं है। भूजल प्रबन्धन ही पानी प्रबन्धन की सबसे पहली और जरूरी बुनियाद है। यह जानते हुए भी हमने इस बुनियाद को कमज़ोर होने दिया है।
हम भूल गए कि पानी का काम कभी अकेले नहीं हो सकता। पानी एक साझा उपक्रम है। अतः इसका प्रबन्धन भी साझे से ही सम्भव है। वैदिक काल से मुगल शासन तक शामिलात संसाधनों का साझा प्रबन्धन विशः, नरिष्ठा, सभा, समिति, खाप, पंचायत आदि के नाम वाले संगठित ग्राम सामुदायिक ग्राम्य संस्थान किया करते थे। अंग्रेजी हुक़ूमत ने भूमि-जमींदारी व्यवस्था के बहाने नए-नए कानून बनाकर ग्राम पंचायतों के अधिकारों में खुला हस्तक्षेप प्रारम्भ किया। इस बहाने पंचों को दण्डित किया जाने लगा। परिणामस्वरूप साझे कार्यों के प्रति पंचायतें धीरे-धीरे निष्क्रिय होती गईं। नतीजा यह हुआ कि सदियों की बनी-बनाई साझा प्रबन्धन और संगठन व्यवस्था टूट गई।
चुनौती यह भी है कि जलसंसाधनों के सरकारी होते ही लोगों ने इन्हेें पराया मान लिया। हालांकि ‘जिसकी भूमि, उसका भूजल’ का निजी अधिकार पहले भी भूमालिकों के हाथ था और आज भी। लेकिन भूजल का अदृश्य भण्डार हमें दिखाई नहीं देता। हमारा समाज आज भी यही मानता है कि जल-जंगल के सतही स्रोत सरकार के हैं। अतः पानी पिलाना, सिंचाई व जंगल का इन्तज़ाम उसी के काम हैं; वही करे।
आज, जब केन्द्र के साथ-साथ राज्य सरकारों ने भी अनेक योजनाओं के क्रियान्वयन के अधिकार पंचायतों को सौंप दिए हैं; बावजूद इसके सरकारी को पराया मानने की नजीर और नजरिया आज पहले से बदतर हुआ है। इसी सोच व नासमझी ने पूरे भारत के जल प्रबन्धन का चक्र उलट दिया है। पूरी जवाबदेही अब सरकार के सिर आ गई है। समाज हकदारी खो चुका है।
यूँ देखें, तो जहाँ-जहाँ समाज ने मान लिया है कि ये स्रोत भले ही सरकार के हों, लेकिन इनका उपयोग तो हम ही करेंगे, वहाँ-वहाँ चित्र बदल गया है तथा वहाँ समाज पानी के संकट से उबर गया है। लेकिन हर जगह का समाज व प्रशासन ऐसे ही हों, जरूरी नहीं है। अतः हकदारी और जवाबदारी की जुगलबन्दी जरूरी है।
सरकारी के प्रति पराएपन के भाव से समाज को उबारने का यही तरीका है। वरना तीन सवाल भारतीय पानी प्रबन्धन के समक्ष नई चुनौती बनकर खड़े ही हैं: प्राकृतिक संसाधनों का मालिक कौन? शासन-प्रशासन प्राकृतिक संसाधनों की ठीक से देखभाल न करें, तो जनता क्या करे? जलापूर्ति पर निर्णय का अधिकार किसका? पानी के व्यावसायीकरण ने यह चुनौती और बढ़ा दी है। भूमि अधिग्रहण के सवाल, भारत के पानी प्रबन्धन को नए सिरे से चुनौती देते दिखाई दे ही रहे हैं।
इन्हीं सवालों के कारण पानी के स्थानीय, अन्तरराज्यीय व अन्तरराष्ट्रीय विवाद हैं। इसी के कारण लोग पानी प्रबन्धन के लिये एक-दूसरे की ओर ताक रहे हैं। इसी के कारण सूखती-प्रदूषित होती नदियों का दुष्प्रभाव झेलने के बावजूद समाज नदियों के पुनर्जीवन के लिए व्यापक स्तर पर आगे आता दिखाई नहीं दे रहा। बाजार भी इसी का लाभ उठा रहा है। परिणामस्वरूप आज भारत के पानी प्रबन्धन को बाढ़-सुखाड़ से इतर तीन नए संकट से जूझना पड़ रहा है।
स्वच्छ और भरपूर पानी के बगैर, न 100 स्मार्ट सिटी का सपना साकार हो सकता है और न औद्योगिक निवेश व विकास का। चाहे नमामि गंगे का संकल्प सिद्ध करना हो या स्वच्छ भारत का, स्वच्छ...निर्मल-अविरल जल के बगैर वह भी सम्भव नहीं। फिल्टर, आरओ और बोतलबन्द पानी के भरोसे विकास का पहिया चल नहीं सकता। विकास की चिन्ता करनी है, तो पानी की चिन्ता तो करनी ही होगी। आइए, भारतीय पानी प्रबन्धन की चुनौतियों पर चिन्तन करें; ताकि विकास भी सतत् रहे और पानी भी।
भारतीय पानी प्रबन्धन की हकीक़त
यह अक्सर कहा जाता है कि भारत में पानी की कमी नहीं, पानी के प्रबन्धन में कमी है। किन्तु क्या पानी का प्रबन्धन सरकारों को कोसने से ठीक हो सकता है? दरअसल, यह न सरकारों को कोसने से ठीक हो सकता है, न रोने से और न किसी के चीखने-चिल्लाने से।
हम इस मुगालते में भी न रहें कि नोट या वोट हमें पानी पिला सकते हैं। वोट पानी पिला सकता, तो देश में सबसे ज्यादा वोट वाले उत्तर प्रदेश के बाँदा-महोबा-हमीरपुर में पानी की कमी के कारण आत्महत्याएँ न होतीं। सिर्फ नोट से ही यदि पानी का सुप्रबन्धन सम्भव होता, तो सबसे अधिक बाँध और हमारी पंचवर्षीय योजनाओं में पानी का सबसे अधिक बजट खाने वाले महाराष्ट्र, इस वर्ष गर्मी आने से पहले ही सिंचाई और पेयजल का संकट से बेजार नहीं होता।
यदि कोई कहे कि कोई कच्छ, चेन्नई और कलपक्कम की तरह करोड़ो फेंककर खारे समुद्री पानी को मीठा बनाने की महंगी तकनीक के बूते सभी को पानी पिला देगा, तो यह भी हकीक़त से मुँह फेर लेना है।
हकीक़त यह है कि हमें हमारी जरूरत का कुल पानी न समुद्र पिला सकता है, न ग्लेशियर, न नदियाँ, न झीलें और न हवा व मिट्टी में मौजूद नमी। पृथ्वी में मौजूद कुल पानी में सीधे इनसे प्राप्त मीठे पानी की हिस्सेदारी मात्र 0.325 प्रतिशत ही है। आज भी पीने योग्य सबसे ज्यादा पानी (1.68 प्रतिशत) धरती के नीचे भूजल के रूप में ही मौजूद है।
हमारी धरती के भूजल की तिजोरी इतनी बड़ी है कि इसमें 213 अरब घन लीटर पानी समा जाए और हमारी जरूरत है मात्र 160 अरब घन लीटर। अब ऐसे में भी यदि निकासी ज्यादा हो जाए और संचयन कम, तो कोई भी पानी खातेदार कंगाल होगा ही होगा।
चुनौतियाँ कई
भारत के पानी प्रबन्धन की चुनौती यह है कि अभी तक देश में जलसंरचनाओं के चिन्हीकरण और सीमांकन का काम ठीक से शुरू भी नहीं किया जा सका है। भारत के पास कहने को राष्ट्रीय व प्रादेशिक स्तर पर अलग-अलग जलनीति जरूर है, लेकिन हमारे पानी प्रबन्धन की चुनौतियों को जिस नदी नीति, बाँध नीति, पानी प्रबन्धन की जवाबदेही तथा उपयोग व मालिकाना सुनिश्चित करने वाली नीति, जल स्रोत से जितना लेना, उसे उतना और वैसा पानी वापस लौटाने की नीति की दरकार है, वह आज भी देश के पास नहीं है। भूजल प्रबन्धन ही पानी प्रबन्धन की सबसे पहली और जरूरी बुनियाद है। यह जानते हुए भी हमने इस बुनियाद को कमज़ोर होने दिया है।
हम भूल गए कि पानी का काम कभी अकेले नहीं हो सकता। पानी एक साझा उपक्रम है। अतः इसका प्रबन्धन भी साझे से ही सम्भव है। वैदिक काल से मुगल शासन तक शामिलात संसाधनों का साझा प्रबन्धन विशः, नरिष्ठा, सभा, समिति, खाप, पंचायत आदि के नाम वाले संगठित ग्राम सामुदायिक ग्राम्य संस्थान किया करते थे। अंग्रेजी हुक़ूमत ने भूमि-जमींदारी व्यवस्था के बहाने नए-नए कानून बनाकर ग्राम पंचायतों के अधिकारों में खुला हस्तक्षेप प्रारम्भ किया। इस बहाने पंचों को दण्डित किया जाने लगा। परिणामस्वरूप साझे कार्यों के प्रति पंचायतें धीरे-धीरे निष्क्रिय होती गईं। नतीजा यह हुआ कि सदियों की बनी-बनाई साझा प्रबन्धन और संगठन व्यवस्था टूट गई।
चुनौती यह भी है कि जलसंसाधनों के सरकारी होते ही लोगों ने इन्हेें पराया मान लिया। हालांकि ‘जिसकी भूमि, उसका भूजल’ का निजी अधिकार पहले भी भूमालिकों के हाथ था और आज भी। लेकिन भूजल का अदृश्य भण्डार हमें दिखाई नहीं देता। हमारा समाज आज भी यही मानता है कि जल-जंगल के सतही स्रोत सरकार के हैं। अतः पानी पिलाना, सिंचाई व जंगल का इन्तज़ाम उसी के काम हैं; वही करे।
आज, जब केन्द्र के साथ-साथ राज्य सरकारों ने भी अनेक योजनाओं के क्रियान्वयन के अधिकार पंचायतों को सौंप दिए हैं; बावजूद इसके सरकारी को पराया मानने की नजीर और नजरिया आज पहले से बदतर हुआ है। इसी सोच व नासमझी ने पूरे भारत के जल प्रबन्धन का चक्र उलट दिया है। पूरी जवाबदेही अब सरकार के सिर आ गई है। समाज हकदारी खो चुका है।
यूँ देखें, तो जहाँ-जहाँ समाज ने मान लिया है कि ये स्रोत भले ही सरकार के हों, लेकिन इनका उपयोग तो हम ही करेंगे, वहाँ-वहाँ चित्र बदल गया है तथा वहाँ समाज पानी के संकट से उबर गया है। लेकिन हर जगह का समाज व प्रशासन ऐसे ही हों, जरूरी नहीं है। अतः हकदारी और जवाबदारी की जुगलबन्दी जरूरी है।
सरकारी के प्रति पराएपन के भाव से समाज को उबारने का यही तरीका है। वरना तीन सवाल भारतीय पानी प्रबन्धन के समक्ष नई चुनौती बनकर खड़े ही हैं: प्राकृतिक संसाधनों का मालिक कौन? शासन-प्रशासन प्राकृतिक संसाधनों की ठीक से देखभाल न करें, तो जनता क्या करे? जलापूर्ति पर निर्णय का अधिकार किसका? पानी के व्यावसायीकरण ने यह चुनौती और बढ़ा दी है। भूमि अधिग्रहण के सवाल, भारत के पानी प्रबन्धन को नए सिरे से चुनौती देते दिखाई दे ही रहे हैं।
इन्हीं सवालों के कारण पानी के स्थानीय, अन्तरराज्यीय व अन्तरराष्ट्रीय विवाद हैं। इसी के कारण लोग पानी प्रबन्धन के लिये एक-दूसरे की ओर ताक रहे हैं। इसी के कारण सूखती-प्रदूषित होती नदियों का दुष्प्रभाव झेलने के बावजूद समाज नदियों के पुनर्जीवन के लिए व्यापक स्तर पर आगे आता दिखाई नहीं दे रहा। बाजार भी इसी का लाभ उठा रहा है। परिणामस्वरूप आज भारत के पानी प्रबन्धन को बाढ़-सुखाड़ से इतर तीन नए संकट से जूझना पड़ रहा है।
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