सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥18-66॥
अर्थ : सभी धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जाओ...मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्ति दिला दूंगा, इसलिए शोक मत करो...।
व्याख्या : श्रीकृष्ण अकर्मण्य होने की शिक्षा नहीं दे रहे हैं। वे पहले ही कह चुके हैं कि परिणाम की चिंता छोड़कर कर्म करो। कर्मयोगी श्रीकृष्ण युद्ध में खड़े अर्जुन को धर्म को त्यागने को कह रहे हैं, कर्म को नहीं। उन सभी धर्र्मों (आचार-व्यवहार) को जो मन में संशय उत्पन्न करते हैं। सामान्य लोग भी ऐसी परिस्थिति से घिर जाते हैं कि समझ नहीं पाते कि क्या किया जाए। यह श्लोक उन्हें सामथ्र्य प्रदान करता है संशयों से बाहर निकलने की। श्रीकृष्ण इसका एक ही उपाय बताते हैं कि सारे संशय पैदा करने वाले कार्य-व्यवहार को त्याग कर मेरी शरण (श्रीकृष्ण एक श्लोक में कह चुके हैं प्रत्येक जड़-चेतन में मैं हूं) में आ जाओ। अर्थात जिस अंतस में मैं हूं, उसकी शरण लो। हर व्यक्ति को अपनी हर समस्या का हल अपने अंतस से ही मिलता है। अंतस कभी व्यक्ति को गलत करने को नहीं कहती। तब सारे संशय मिट जाते हैं और शोक भी उत्पन्न नहीं होता।
मन
यदि कोई समस्या सामने आ खड़ी हुई है, तो पलायन सही उपाय नहीं है। उसका डटकर मुकाबला करना चाहिए। मन में जब विकार जागता है, तब उस पर गौर करना चाहिए। उसका सामना करना चाहिए। जैसे ही विकार को आप देखना शुरू करते हैं, वह क्षीण होता जाता है और धीरे-धीरे उसका क्षय हो जाता है।
वचन
आचार्य चाणक्य कहते हैं, मधुर वचन बोलने से सब जीव संतुष्ट होते हैं। आपके दो मीठे बोल किसी के जीवन में वसंत-सा वातावरण बना दें, तो समझ लीजिए आपका हृदय पूजा के धूप दान की तरह स्नेह और सौरभ प्रदान करता रहेगा।
कर्म
जीवन एक दर्पण है, जो आपके कर्मों को दिखाता है। जैसा आप बोते हैं, वैसा ही पाते हैं। यदि आप दूसरों को खुशियां देते हैं तो वे भी आपके चेहरे पर मुस्कान लाते हैं।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥18-66॥
अर्थ : सभी धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जाओ...मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्ति दिला दूंगा, इसलिए शोक मत करो...।
व्याख्या : श्रीकृष्ण अकर्मण्य होने की शिक्षा नहीं दे रहे हैं। वे पहले ही कह चुके हैं कि परिणाम की चिंता छोड़कर कर्म करो। कर्मयोगी श्रीकृष्ण युद्ध में खड़े अर्जुन को धर्म को त्यागने को कह रहे हैं, कर्म को नहीं। उन सभी धर्र्मों (आचार-व्यवहार) को जो मन में संशय उत्पन्न करते हैं। सामान्य लोग भी ऐसी परिस्थिति से घिर जाते हैं कि समझ नहीं पाते कि क्या किया जाए। यह श्लोक उन्हें सामथ्र्य प्रदान करता है संशयों से बाहर निकलने की। श्रीकृष्ण इसका एक ही उपाय बताते हैं कि सारे संशय पैदा करने वाले कार्य-व्यवहार को त्याग कर मेरी शरण (श्रीकृष्ण एक श्लोक में कह चुके हैं प्रत्येक जड़-चेतन में मैं हूं) में आ जाओ। अर्थात जिस अंतस में मैं हूं, उसकी शरण लो। हर व्यक्ति को अपनी हर समस्या का हल अपने अंतस से ही मिलता है। अंतस कभी व्यक्ति को गलत करने को नहीं कहती। तब सारे संशय मिट जाते हैं और शोक भी उत्पन्न नहीं होता।
मन
यदि कोई समस्या सामने आ खड़ी हुई है, तो पलायन सही उपाय नहीं है। उसका डटकर मुकाबला करना चाहिए। मन में जब विकार जागता है, तब उस पर गौर करना चाहिए। उसका सामना करना चाहिए। जैसे ही विकार को आप देखना शुरू करते हैं, वह क्षीण होता जाता है और धीरे-धीरे उसका क्षय हो जाता है।
वचन
आचार्य चाणक्य कहते हैं, मधुर वचन बोलने से सब जीव संतुष्ट होते हैं। आपके दो मीठे बोल किसी के जीवन में वसंत-सा वातावरण बना दें, तो समझ लीजिए आपका हृदय पूजा के धूप दान की तरह स्नेह और सौरभ प्रदान करता रहेगा।
कर्म
जीवन एक दर्पण है, जो आपके कर्मों को दिखाता है। जैसा आप बोते हैं, वैसा ही पाते हैं। यदि आप दूसरों को खुशियां देते हैं तो वे भी आपके चेहरे पर मुस्कान लाते हैं।
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