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Tuesday, 21 April 2015

हर नवजात की किस्मत पार्वती जैसी क्यों नहीं

भारत ने युद्ध से बेहाल यमन से एक नवजात बच्ची को सकुशल बाहर निकाला है। पीलिया से पीड़ित और फेफड़े में गंभीर संक्रमण से ग्रस्त लगभग एक सप्ताह की इस बच्ची पार्वती को, जिसके साथ डॉक्टर भी था, इनक्यूबेटर में यमन की राजधानी सना से एक भारतीय जहाज में जिबूती ले जाया गया। वहां से उसकी मां एयर इंडिया के विमान में उसे कोच्चि ले आई। यमन में बतौर नर्स काम कर रही राजी ने आठवें महीने में पार्वती को जन्म दिया था। पार्वती के बचने की उम्मीद कम ही थी। पर ऑपरेशन राहत जैसे असाधारण अभियान ने पार्वती के बारे में पैदा आशंकाओं को गलत साबित कर दिया। अब केरल के एक निजी अस्पताल� में पार्वती स्वास्थ्य लाभ कर रही है। केरल सरकार ने उसके चिकित्सा खर्च के भुगतान का वायदा किया है।



दुर्भाग्य यह है कि अपने देश में हर नवजात ऐसा भाग्य लिखाकर नहीं लाता। नवजात मृत्यु दर (एक से सत्ताईस दिन) के मामले में भारत विश्व में पहले स्थान पर है। 2012 में दुनिया भर में तीस लाख नवजात बच्चों की मौत हुई थी, जिनमें से 7,79,000 बच्चे भारत के थे। समय पर चिकित्सीय पहल से इनमें से ज्यादातर बच्चों को बचाया जा सकता था। हम अशांत क्षेत्र से तो बच्चों को बचाकर निकाल लाते हैं, पर सामान्य स्थितियों में बच्चों को बचा पाने में विफल रहते हैं। ऐसा क्यों? यह उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। देश में सालाना जितने नवजातों की मौत होती है, उनमें से आधी से अधिक मृत्यु उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में होती है। उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2015-16 को 'माता और शिशु वर्ष' घोषित करने की योजना बनाई है। इसके पीछे उद्देश्य यह है कि ज्यादातर महिलाएं अस्पतालों में बच्चों को जन्म दें। इससे जुड़ी दूसरी योजनाएं हैं-ग्राम स्वास्थ्य और पोषण दिवसों को शक्तिशाली बनाना, ताकि प्रसव पूर्व सावधानी, जच्चा-बच्चा सुरक्षा, गर्भवती महिलाओं को आयरन सप्लीमेंट और नवजातों को पोषक पदार्थों का वितरण तथा पति-पत्नी व गर्भवती महिलाओं को सलाह देने का काम सुचारु रूप से किया जा सके।

यह अच्छी पहल है। अक्सर गलत वजहों से सुर्खियों में रहने वाली अखिलेश सरकार को इसके लिए बधाई देनी चाहिए कि उसने जननी और शिशु सुरक्षा को महत्व देने का फैसला किया है। पर राज्य सरकार इस मोर्चे पर कितनी सफल होती है, यह इस दिशा में उसके कामकाज पर निर्भर करेगा।

नवजातों को बचाने के लिए रॉकेट साइंस जानने की जरूरत नहीं है। सिर्फ चिकित्सकीय हस्तक्षेप से यह काम संभव हो सकता है। इसके साथ कुछ दूसरी चुनौतियों से भी निपटना होगा। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. बॉबी जॉन नवजातों की सुरक्षा के लिए कुछ जरूरी चीजों का उल्लेख करते हैं, जैसे-मां का शैक्षिक स्तर, गर्भावस्था और प्रसवोपरांत उनके पोषण का ख्याल रखना, उन पर असर डालने वाले सामाजिक हालात तथा वैसी जानकारियां हासिल करने की उनकी क्षमता, जो बच्चे का विकास सुनिश्चित करे। कई बार साफ-सफाई की कमी से बच्चों की मौत हो जाती है। प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों का अभाव भी एक बड़ी समस्या है। प्रसव के समय सावधानी न सिर्फ मां और शिशु को बचाती है, यह नवजातों में कई विरूपताओं को भी रोकती है। बीमार नवजातों की देखभाल के लिए इनक्यूबेटर जैसे उपकरणों की जरूरत पड़ती है, जो उन्हें गर्म रख सके। पर ऐसे उपकरणों के अभाव में भी कई घरेलू तरीकों से नवजातों की जान बचाई जा सकती है। इसके लिए जरूरी यह है कि गर्भवती स्त्री और उसके परिवार के लोगों को इस बारे में जागरूक किया जाए। उत्तर प्रदेश में नवजातों की मौत की एक बड़ी वजह माताओं का अल्पशिक्षित होना भी है। शिशु इसलिए भी मर जाते हैं, क्योंकि उनमें बीमारी की पहचान करने में देर हो जाती है। बीमार बच्चों को चिकित्सीय मदद मिलने में भी विलंब होता है। बेशक धीमी गति से ही सही, पर चीजें अब बदलने लगी हैं। कई गैरसरकारी संस्थाएं इस दिशा में आगे आई हैं। उत्तर प्रदेश टेक्निकल सपोर्ट यूनिट, जिसे बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की मदद मिलती है, के कार्यकारी निदेशक विकास गोठलवाल कहते हैं कि उनकी संस्था नर्सों और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण में बड़ी भूमिका निभा रही है। मसलन, उत्तर प्रदेश के 820 में से 100 ब्लॉकों में इतने ही नर्स मेंटर्स हैं। ये अनुभवी नर्सें स्थानीय नर्सों के प्रशिक्षण में मदद करती हैं।� स्वास्थ्यकर्मी भी एसएमएस के जरिये जानकारियां हासिल करते हैं।

पिछले साल इंडियन न्यू बोर्न ऐक्शन प्लान की लांचिंग हुई। पर उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में नवजातों की स्थिति तभी सुधरेगी, जब इस दिशा में उन इलाकों में भी युद्ध स्तर पर काम होगा, जहां युद्ध जैसी स्थिति नहीं है।

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