पिछले वर्ष जुलाई में जब डिजिटल इंडिया कार्यक्रम की घोषणा हुई थी, तब
मैंने मोदी सरकार की सराहना की थी कि उसने शासन और सरकार व नागरिकों के बीच
बेहतर तालमेल के लिए प्रौद्योगिकी और इंटरनेट की परिवर्तनकारी क्षमता
पहचानी है। मैंने हमेशा कहा है कि डिजिटल इंडिया की सोच को साकार करने के
लिए विशेष कार्यनीति की जरूरत है! इसमें दखलकारी सरकारी नियंत्रण से
इंटरनेट को मुक्त करना भी शामिल है, ताकि इंटरनेट सबके लिए सस्ता और सुलभ
हो। हाल ही में जब सुप्रीम कोर्ट ने मेरी याचिका के दावे को सही ठहराया और
आईटी ऐक्ट की धारा 66 ए को खारिज किया, तो स्पष्ट रूप से मैंने समझा कि यह न
केवल नागरिकों की डिजिटल स्वतंत्रता के लिए, बल्कि डिजिटल इंडिया के लिए
भी सकारात्मक विकास है।
इसका स्पष्ट आभास हो रहा था कि सरकार अगले कदम के रूप में प्रौद्योगिकी सुधार के लिए एक उपयुक्त नीतिगत ढांचा तैयार करेगी, जिससे डिजिटल इंडिया का श्रीगणेश होगा। अन्य कदमों के साथ इसमें बिना किसी भेदभाव के, जिसे नेट न्यूट्रैलिटी (नेट तटस्थता) कहा जाता है, इंटरनेट का विकास भी शामिल होगा, जो यह सुनिश्चित करेगा कि इंटरनेट एक स्वतंत्र, सहयोगात्मक और सुलभ मंच हो। मैंने नेट तटस्थता पर स्थायी समिति की बैठक में इसकी वकालत की थी। ट्राई के चेयरमैन ने मुझसे वायदा किया कि इस मुद्दे पर निष्पक्ष एवं खुला विचार-विमर्श होगा।
हालांकि दूरसंचार नियामक ट्राई ने कुछ हैरान करने वाला फैसला किया। उसने हाल ही में 'रेगुलेटरी फ्रेमवर्क फॉर ओवर द टॉप सर्विसेज (ओटीपी)' नामक परामर्श रिपोर्ट जारी की, जिसमें बेहद संदिग्ध तरीके से टेलीकॉम ऑपरेटरों का पक्ष लिया गया है।
यह रिपोर्ट न केवल विनियामक ढांचे को जरूरी मानती है, बल्कि सक्रिय ढंग से इसकी भी वकालत करती दिखती है कि टेलीकॉम कंपनियों को स्काइप और वाइबर जैसी कुछ सेवाओं के लिए अलग से पैसा वसूल करने की छूट देने के साथ वैसे उपभोक्ताओं की इंटरनेट तक पहुंच धीमी बनाने की भी इजाजत देनी चाहिए, जो लोग कुछ खास सेवाओं के लिए अलग पैसा देने के लिए तैयार नहीं हैं।
जैसा कि हम जानते हैं, इंटरनेट एक ऐसा नेटवर्क है, जहां सभी सूचनाएं व सेवाएं डाटा पैकेट्स के रूप में प्रेषित की जाती हैं। उपभोक्ताओं द्वारा उपयोग किए जाने वाले सभी डाटा पैकेट्स के साथ सेवा प्रदाताओं द्वारा समान व्यवहार किया जाना चाहिए, चाहे किसी भी तरह की सामग्री या सेवाओं-वाट्सएप, वाइबर, गूगल या फेसबुक-का उपयोग किया जा रहा हो। जो कंपनिया इस भेदभावपूर्ण मूल्य का प्रस्ताव कर रही हैं, वे इस क्षेत्र की बड़ी खिलाड़ी हैं, और इंटरनेट के गेटकीपर की तरह उपभोक्ताओं की वहां तक पहुंच को नियंत्रित करना चाहती हैं। वे न सिर्फ कुछ सेवाओं के लिए अधिक मूल्य वसूल करना चाहती हैं, बल्कि कुछ वैसी नई तकनीकों को प्रतिबंधित भी करना चाहती हैं, जिनसे उनके उपकरणों की तीव्र प्रतिद्वंद्विता की आशंका है। मतलब यह कि कुछ कंपनियां भारतीय उपभोक्ताओं की पसंद को नियंत्रित करना चाहती हैं।
रिपोर्ट पढ़ते हुए मैंने उसके कई ऐसे अंश देखे, जो निष्पक्षता के प्रति नियामक की अनदेखी के बारे में बताते हैं। मसलन, रिपोर्ट के शुरू में एक हिस्सा है, जो स्काइप जैसी ओवर द टॉप सर्विसेज (ओटीटी) के विस्तार के कारण टेलीकॉम ऑपरेटरों के राजस्व पर पड़े विपरीत प्रभाव के बारे में विस्तार से बताता है। यह तर्क तब दिया जा रहा है, जब तमाम तथ्य इसकी पुष्टि करते हैं कि टेलीकॉम ऑपरेटर अब भी मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। इसके अलावा ओवर द टॉप सर्विसेज के विकास से भी उन्हें लाभ हो रहा है। किसी नियामक को यह अधिकार नहीं कि 'विपरीत प्रभाव' पड़ने का तर्क देकर वह उपभोक्ताओं को नवोन्मेष और उनकी पसंद तक पहुंच बनाने से रोके।
ट्राई इससे पूरी तरह बेखबर है कि ओटीटी के विनियमन का उपभोक्ताओं और इंटरनेट आधारित स्टार्टअप पर विपरीत असर पड़ेगा। हद यह है कि सभी हितसाधकों पर पड़ने वाले प्रभावों पर विचार किए बिना ही ट्राई कहता है, 'एक गैर बराबरी वाले क्षेत्र में ओटीटी एप प्रदाताओं को सार्वजनिक सुरक्षा और उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा के लिए देश के मौजूदा विनियामक व्यवस्था के दायरे में भला किस तरह लाया जा सकता है?' ऐसे में एक अनजान व्यक्ति को लगेगा कि टेलीकॉम ऑपरेटर ही ओटीटी के विस्तार की कीमत चुका रहे हैं।
ओटीटी सेवाओं का विकास इंटरनेट द्वारा प्रदान किए गए नवाचार के जबर्दस्त अवसर की मिसाल है। फ्लिपकार्ट, अलीबाबा और स्नैपडील जैसे व्यवसायों की सफलता के पीछे निष्पक्ष इंटरनेट है। इनसे नागरिकों के जीवन में सुधार और उपभोक्ताओं की पसंद का विस्तार हुआ है। हमारी नीतियां उपभोक्ताओं की पसंद को नकारने की इजाजत नहीं दे सकतीं। डिजिटल नीति ऐसी होनी चाहिए, जो टेलीकॉम आपरेटरों को चुस्त एवं नवोन्मेषी बनने के लिए प्रोत्साहित करे। बैंडविथ एवं गति केवल साधन हैं, जिसके जरिये दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को नई मूल्य प्रणाली बनाने की इजाजत दी जानी चाहिए। लेकिन विषय-वस्तु को उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं देना चाहिए। स्वतंत्र, मुक्त और सुलभ इंटरनेट नवाचार, संपर्क और आर्थिक विकास के लिए जरूरी है।नेट तटस्थता इस बात में निहित है कि इंटरनेट तक पहुंच बनाने और उसका उपयोग करने में उपभोक्ता कितना सक्षम है। ओटीटी सेवाओं के उपयोग के लिए उपभोक्ता पर शर्त नहीं थोपी जानी चाहिए और इंटरनेट पर प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। अगले महीने के बाद इस संबंध में सरकार का फैसला आएगा, जो आगामी कई दशकों के लिए भारत के डिजिटल स्वरूप को निर्धारित करेगा। इंटरनेट इतना जरूरी है कि कुछेक निजी टेलीकॉम कंपनियों को यह निर्णय देने का अधिकार नहीं दिया जा सकता कि उपभोक्ताओं के लिए क्या कानून बनेगा!
इसका स्पष्ट आभास हो रहा था कि सरकार अगले कदम के रूप में प्रौद्योगिकी सुधार के लिए एक उपयुक्त नीतिगत ढांचा तैयार करेगी, जिससे डिजिटल इंडिया का श्रीगणेश होगा। अन्य कदमों के साथ इसमें बिना किसी भेदभाव के, जिसे नेट न्यूट्रैलिटी (नेट तटस्थता) कहा जाता है, इंटरनेट का विकास भी शामिल होगा, जो यह सुनिश्चित करेगा कि इंटरनेट एक स्वतंत्र, सहयोगात्मक और सुलभ मंच हो। मैंने नेट तटस्थता पर स्थायी समिति की बैठक में इसकी वकालत की थी। ट्राई के चेयरमैन ने मुझसे वायदा किया कि इस मुद्दे पर निष्पक्ष एवं खुला विचार-विमर्श होगा।
हालांकि दूरसंचार नियामक ट्राई ने कुछ हैरान करने वाला फैसला किया। उसने हाल ही में 'रेगुलेटरी फ्रेमवर्क फॉर ओवर द टॉप सर्विसेज (ओटीपी)' नामक परामर्श रिपोर्ट जारी की, जिसमें बेहद संदिग्ध तरीके से टेलीकॉम ऑपरेटरों का पक्ष लिया गया है।
यह रिपोर्ट न केवल विनियामक ढांचे को जरूरी मानती है, बल्कि सक्रिय ढंग से इसकी भी वकालत करती दिखती है कि टेलीकॉम कंपनियों को स्काइप और वाइबर जैसी कुछ सेवाओं के लिए अलग से पैसा वसूल करने की छूट देने के साथ वैसे उपभोक्ताओं की इंटरनेट तक पहुंच धीमी बनाने की भी इजाजत देनी चाहिए, जो लोग कुछ खास सेवाओं के लिए अलग पैसा देने के लिए तैयार नहीं हैं।
जैसा कि हम जानते हैं, इंटरनेट एक ऐसा नेटवर्क है, जहां सभी सूचनाएं व सेवाएं डाटा पैकेट्स के रूप में प्रेषित की जाती हैं। उपभोक्ताओं द्वारा उपयोग किए जाने वाले सभी डाटा पैकेट्स के साथ सेवा प्रदाताओं द्वारा समान व्यवहार किया जाना चाहिए, चाहे किसी भी तरह की सामग्री या सेवाओं-वाट्सएप, वाइबर, गूगल या फेसबुक-का उपयोग किया जा रहा हो। जो कंपनिया इस भेदभावपूर्ण मूल्य का प्रस्ताव कर रही हैं, वे इस क्षेत्र की बड़ी खिलाड़ी हैं, और इंटरनेट के गेटकीपर की तरह उपभोक्ताओं की वहां तक पहुंच को नियंत्रित करना चाहती हैं। वे न सिर्फ कुछ सेवाओं के लिए अधिक मूल्य वसूल करना चाहती हैं, बल्कि कुछ वैसी नई तकनीकों को प्रतिबंधित भी करना चाहती हैं, जिनसे उनके उपकरणों की तीव्र प्रतिद्वंद्विता की आशंका है। मतलब यह कि कुछ कंपनियां भारतीय उपभोक्ताओं की पसंद को नियंत्रित करना चाहती हैं।
रिपोर्ट पढ़ते हुए मैंने उसके कई ऐसे अंश देखे, जो निष्पक्षता के प्रति नियामक की अनदेखी के बारे में बताते हैं। मसलन, रिपोर्ट के शुरू में एक हिस्सा है, जो स्काइप जैसी ओवर द टॉप सर्विसेज (ओटीटी) के विस्तार के कारण टेलीकॉम ऑपरेटरों के राजस्व पर पड़े विपरीत प्रभाव के बारे में विस्तार से बताता है। यह तर्क तब दिया जा रहा है, जब तमाम तथ्य इसकी पुष्टि करते हैं कि टेलीकॉम ऑपरेटर अब भी मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। इसके अलावा ओवर द टॉप सर्विसेज के विकास से भी उन्हें लाभ हो रहा है। किसी नियामक को यह अधिकार नहीं कि 'विपरीत प्रभाव' पड़ने का तर्क देकर वह उपभोक्ताओं को नवोन्मेष और उनकी पसंद तक पहुंच बनाने से रोके।
ट्राई इससे पूरी तरह बेखबर है कि ओटीटी के विनियमन का उपभोक्ताओं और इंटरनेट आधारित स्टार्टअप पर विपरीत असर पड़ेगा। हद यह है कि सभी हितसाधकों पर पड़ने वाले प्रभावों पर विचार किए बिना ही ट्राई कहता है, 'एक गैर बराबरी वाले क्षेत्र में ओटीटी एप प्रदाताओं को सार्वजनिक सुरक्षा और उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा के लिए देश के मौजूदा विनियामक व्यवस्था के दायरे में भला किस तरह लाया जा सकता है?' ऐसे में एक अनजान व्यक्ति को लगेगा कि टेलीकॉम ऑपरेटर ही ओटीटी के विस्तार की कीमत चुका रहे हैं।
ओटीटी सेवाओं का विकास इंटरनेट द्वारा प्रदान किए गए नवाचार के जबर्दस्त अवसर की मिसाल है। फ्लिपकार्ट, अलीबाबा और स्नैपडील जैसे व्यवसायों की सफलता के पीछे निष्पक्ष इंटरनेट है। इनसे नागरिकों के जीवन में सुधार और उपभोक्ताओं की पसंद का विस्तार हुआ है। हमारी नीतियां उपभोक्ताओं की पसंद को नकारने की इजाजत नहीं दे सकतीं। डिजिटल नीति ऐसी होनी चाहिए, जो टेलीकॉम आपरेटरों को चुस्त एवं नवोन्मेषी बनने के लिए प्रोत्साहित करे। बैंडविथ एवं गति केवल साधन हैं, जिसके जरिये दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को नई मूल्य प्रणाली बनाने की इजाजत दी जानी चाहिए। लेकिन विषय-वस्तु को उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं देना चाहिए। स्वतंत्र, मुक्त और सुलभ इंटरनेट नवाचार, संपर्क और आर्थिक विकास के लिए जरूरी है।नेट तटस्थता इस बात में निहित है कि इंटरनेट तक पहुंच बनाने और उसका उपयोग करने में उपभोक्ता कितना सक्षम है। ओटीटी सेवाओं के उपयोग के लिए उपभोक्ता पर शर्त नहीं थोपी जानी चाहिए और इंटरनेट पर प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। अगले महीने के बाद इस संबंध में सरकार का फैसला आएगा, जो आगामी कई दशकों के लिए भारत के डिजिटल स्वरूप को निर्धारित करेगा। इंटरनेट इतना जरूरी है कि कुछेक निजी टेलीकॉम कंपनियों को यह निर्णय देने का अधिकार नहीं दिया जा सकता कि उपभोक्ताओं के लिए क्या कानून बनेगा!

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