21वीं सदी के इस दूसरे दशक में भारत के पानी समक्ष पेश नए संकट ये तीन ही
हैं। जो उद्योग या किसान जेट अथवा समर्सिबल पम्प लगाकर धकाधक भूजल खींच रहा
है, उस पर कोई पाबन्दी नहीं कि जितना लिया, उतना पानी वापस धरती को लौटाए।
हालांकि अभी हाल ही में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने एक मामले में
उद्योगों को ऐसे आदेश जारी किए हैं; लेकिन जब तक ‘रेलनीर’ या हमारे दूसरे
सरकारी संयन्त्र खुद यह सुनिश्चित नहीं करते कि उन्होंने जिन इलाकों का
पानी खींचा है, उन्हें वैसा और उतना पानी वे कैसे लौटाएँगे, तब तक सरकार
गैर-सरकारी को कैसे बाध्य कर सकती है? यही हाल अतिक्रमण का है।
देश में जल-संरचनाओं की जमीनों पर सरकारी-गैर-सरकारी कब्जे के उदाहरण एक नहीं, लाखों हैं। तहसील अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक कई ऐतिहासिक आदेशों के बावजूद स्थिति बहुत बदली नहीं है। जहाँ तक प्रदूषण का सवाल है, हमने उद्योगों को नदी किनारे बसाने के लिए दिल्ली-मुम्बई औद्योगिक गलियारा, लोकनायक गंगापथ और गंगा-यमुना एक्सप्रेस वे आदि परियोजनाएँ तो बना ली, लेकिन इनके किनारे बसने वाले उद्योंगों द्वारा उत्सर्जित प्रदूषण केे स्रोत पर प्रदूषण निपटारे की कोई ठोस व्यवस्था योजना हम आज तक सुनिश्चित नहीं कर पाए हैं; जबकि प्रदूषण प्रबन्धन का सिद्धान्त यही है।
देश में जल-संरचनाओं की जमीनों पर सरकारी-गैर-सरकारी कब्जे के उदाहरण एक नहीं, लाखों हैं। तहसील अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक कई ऐतिहासिक आदेशों के बावजूद स्थिति बहुत बदली नहीं है। जहाँ तक प्रदूषण का सवाल है, हमने उद्योगों को नदी किनारे बसाने के लिए दिल्ली-मुम्बई औद्योगिक गलियारा, लोकनायक गंगापथ और गंगा-यमुना एक्सप्रेस वे आदि परियोजनाएँ तो बना ली, लेकिन इनके किनारे बसने वाले उद्योंगों द्वारा उत्सर्जित प्रदूषण केे स्रोत पर प्रदूषण निपटारे की कोई ठोस व्यवस्था योजना हम आज तक सुनिश्चित नहीं कर पाए हैं; जबकि प्रदूषण प्रबन्धन का सिद्धान्त यही है।
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