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Friday, 8 May 2015

बैंक हड़ताल से आमजन चिंतित वेतन सुविधा में केन्द्रकर्मी बराबर?

मुम्बई (महाराष्टड्ढ्र) केन्द्र सरकार व बैकों के संगठन आईबीए द्वारा यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन (यूएफबीयू) की बैक कार्मिकों की वेतन व अन्य समस्याओं के समाधान में ढुलमुल रुप अपनाने से बढते टकराव के कारण २५ से २८ फरवरी तक चार दिवसीय हड़ताल पर उद्यम व आम जन में चिंता बढ़ गई है। वित्तीय वर्ष १४-१५ के समाप्ति के पूर्व माह में बैकों की बंदी अर्थव्यवस्था को गड़बडा देगी।
फोरम के अध्यक्ष के के नायर कहते है कि बैंक कार्मियों के बीच दरार पैदा करने के प्रयास सफल न होगे बल्कि इस प्रयासों से बैंककर्मी अधिक सबल होकर अपनी समस्याओं को सरकार या आईबीए को न ही बल्कि जनता के समक्ष रखेगे। जनता की शाक्ति हो उन्हे समझाएंगी।
बैंक आफ बड़ौदा के के एक जिम्मेदार वरिष्ठ प्रबन्धक संजय अग्रवाल एवं इसी बैंक के निदेशक प्रेम मक्कड़ कहते है कि बैंक देश की अर्थव्यवस्था की रीढ है फिर भी इस क्षेत्र की उपेक्षा को बैंक कर्मी को केन्द्र सरकार के कार्मिकों से कम वेतन पर जिम्मेदारियां अधिक यह अन्तर ४०-४५ प्रतिशत कम है। अखिल भारतीय बैंक अधिकारी संघ के अध्यक्ष एस एस सिसौदिया ने उम्मीद जाहिर की कि सरकार व आईबीए द्वारा २१ से २४ जनवरी की हड़ताल को टालने के लिए जो सकारात्मकता दिखाई थी उसे ढुलमुलता को समय रहते खत्म किया जायेगा।
देश में सरकार द्वारा जो विकास की अपेक्षा की है उसे लाने मे बैंक भूमिका अग्रणी है वह बैंक कार्मियों की अपने केन्द्र कर्मी के समकक्षता लाना होगा। यूं जिम्मेदारी देखते हुए अपर स्तर सुविधाओं में मिलना चाहिए।
सातंवा वेतन आयोग पर केन्द्र चुप्पी से असमजस्य
पूर्ववती भारत सरकार द्वारा गत वर्ष सातंवा वेतन आयोग गठन की घोषणा की गई थी, वर्तमान केन्द्र सरकार की इस पर चुप्पी ने केन्द्र व राज्य कर्मचारियों मे बैचनी बढा रही है और इनके स्तर पर भी आन्दोलन की तैयारी का समाचार है। बैंक कार्मिकों के वेतन व केन्द्र सरकार के कार्मिक वेतन मानों में अन्तर की दिवार न बढे इसके लिए जरुरी है कि बैंक व केन्द्र कार्मिकों के वेतन पुनरीक्षण का कार्य साथ हो या फिर केन्द्र सरकार वेतन वृद्धि व सुविधाओं के निर्धारण के मापदण्ड नियत करें, तब ही प्रधानमन्त्री का सबका साथ सबका विकास का आवाहन रास्ता पा सकता है,यह विचार श्रमशिखर के पाठक एवं चितंक नई दिल्ली के प्रमुख व्यवसायी, चितंक श्री रवि प्रकाश मित्तल व्यक्त किए। श्री मित्तल समय-समय पर केन्द्र सरकार स्तर पर अपने विचारों से अवगत कराते रहते है। उन्होने बैंक, बिजली व सरकारी कार्मिकों के आन्दोलनों की स्थिति लाये जाने को बेहतर सरकार की स्थिति में नही लाता। हड़ताल की स्थिति आपसी विश्वास को परिलक्षित करती है, जबकि काम कराने व करने वाले के बीच सबसे अहम है।
श्रमशिखर से बातचीत में श्रमशिखर के हमारों पाठकों ने बैंक या केन्द्र कर्मचारियों की समस्याओं बनें रह कर उन्हे टालने की प्रकृति या फिर निजी क्षेत्र को समस्याओं के समाधान की बढती प्रकृति को अहितकर बताया। सरकारी व निजी के प्रतिस्पर्धा में रहना देश हित में है।

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